
ब्यूरो चीफ रविसिंह किरार/ परिष्कार पत्रिका जयपुर। किसी भी देश की शक्ति का वास्तविक आकलन केवल उसकी आर्थिक वृद्धि, सैन्य क्षमता, ऊँची इमारतों, चमकते राजमार्गों या विश्व मंच पर उसके बढ़ते प्रभाव से नहीं किया जा सकता। इन सबका अपना महत्व है, लेकिन किसी राष्ट्र की असली ताकत इस बात में निहित होती है कि उसके नागरिक कितनी शांति, सुरक्षा, सम्मान और विश्वास के साथ अपना जीवन जी रहे हैं। विकास की चमक तभी सार्थक है, जब उसकी रोशनी गाँव के आखिरी घर तक पहुँचे और शांति तभी वास्तविक है, जब समाज के भीतर एक-दूसरे के प्रति भय नहीं, भरोसा हो।आज देश के सामने अनेक चुनौतियाँ हैं। आर्थिक विकास की गति को बनाए रखना है, रोजगार के अवसर पैदा करने हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य को बेहतर बनाना है, किसानों की समस्याओं का समाधान करना है, युवाओं की आकांक्षाओं को दिशा देनी है और तेजी से बदलती तकनीक के बीच मानवीय मूल्यों को बचाए रखना है। इन सबके बीच एक ऐसी चिंता भी है, जिस पर पर्याप्त गंभीरता से विचार होना चाहिए—हम विकास की दौड़ में कहीं सामाजिक शांति और सह-अस्तित्व की बुनियादी जमीन तो नहीं खो रहे?
भारत की पहचान केवल उसकी विविधता में नहीं, बल्कि उस विविधता के साथ जीने की उसकी ऐतिहासिक क्षमता में रही है। अलग-अलग भाषाएँ, धर्म, संस्कृतियाँ, खान-पान, पहनावे और जीवन-पद्धतियाँ यहाँ सदियों से साथ-साथ रही हैं। असहमति भी रही, संघर्ष भी हुए, लेकिन सह-अस्तित्व की धारा कभी पूरी तरह सूखी नहीं। यही भारत की सबसे बड़ी पूँजी है।इसलिए आज देश को सबसे अधिक आवश्यकता उस वातावरण की है जिसमें मतभेद हों, मगर मनभेद न हों; राजनीतिक प्रतिस्पर्धा हो, मगर सामाजिक वैमनस्य न हो; विचारों का संघर्ष हो, मगर मनुष्यों के बीच दीवारें न खड़ी हों।शांति का अर्थ केवल सीमा पर युद्ध का न होना नहीं है। शांति का अर्थ यह भी है कि एक नागरिक दूसरे नागरिक की पहचान, आस्था, भाषा या विचार से असहमत होकर भी उसके अस्तित्व का सम्मान करे। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है। असहमति को देशद्रोह समझ लेना लोकतांत्रिक चेतना को कमजोर करता है और हर बहस को दुश्मनी में बदल देना सामाजिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी सार्वजनिक भाषा पर भी विचार करें। शब्द समाज बनाते हैं और शब्द ही समाज को तोड़ भी सकते हैं। जब सार्वजनिक जीवन में संवाद की जगह आरोप, तर्क की जगह उत्तेजना और असहमति की जगह अपमान ले लेता है, तब धीरे-धीरे सामाजिक विश्वास क्षीण होने लगता है। किसी भी लोकतंत्र के लिए यह स्थिति शुभ नहीं हो सकती।देश की दूसरी बड़ी चिंता जमीनी विकास की है। विकास के बड़े-बड़े आंकड़े निश्चित रूप से उत्साह देते हैं, लेकिन विकास का अंतिम प्रमाण आंकड़ों की तालिकाओं में नहीं, नागरिक के दैनिक जीवन में दिखाई देना चाहिए। गाँव में पानी है या नहीं, किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिलता है या नहीं, बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है या नहीं, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र वास्तव में काम कर रहा है या नहीं, युवाओं को रोजगार के अवसर मिल रहे हैं या नहीं—ये प्रश्न विकास की असली परीक्षा हैं।
एक ऐसा गाँव जहाँ सड़क तो बन गई हो, लेकिन पीने का पानी न हो; जहाँ मोबाइल नेटवर्क पहुँच गया हो, लेकिन विद्यालय में शिक्षक न हों; जहाँ सरकारी योजना का बोर्ड लगा हो, लेकिन उसका लाभ पात्र व्यक्ति तक न पहुँचे—उसे विकास की पूर्ण तस्वीर नहीं कहा जा सकता।जमीनी विकास का अर्थ केवल भौतिक निर्माण भी नहीं है। विकास का अर्थ है मानवीय गरिमा में वृद्धि। यदि किसी गरीब परिवार को इलाज के लिए जमीन बेचनी पड़े, किसी बच्चे की पढ़ाई आर्थिक मजबूरी के कारण रुक जाए, किसी युवा को वर्षों तक रोजगार की तलाश में भटकना पड़े या किसी बुजुर्ग को अपने ही समाज में उपेक्षित महसूस करना पड़े, तो हमें विकास के अर्थ को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है।
देश की सबसे बड़ी युवा आबादी हमारी सबसे बड़ी शक्ति हो सकती है, लेकिन इसके लिए युवाओं को केवल भाषणों में भविष्य का निर्माता कह देना पर्याप्त नहीं। उन्हें शिक्षा, कौशल, रोजगार, उद्यम और रचनात्मक अवसर देने होंगे। बेरोजगार युवा के हाथ में केवल डिग्री और निराशा हो तो जनसांख्यिकीय लाभांश धीरे-धीरे जनसांख्यिकीय दबाव में बदल सकता है।इसी तरह किसानों की स्थिति भी देश के विकास की केंद्रीय कसौटी है। कृषि केवल अर्थव्यवस्था का क्षेत्र नहीं, करोड़ों परिवारों के जीवन का आधार है। खेती की लागत, पानी की उपलब्धता, बाजार, भंडारण, मौसम की अनिश्चितता और उचित मूल्य जैसे प्रश्नों का स्थायी समाधान किए बिना ग्रामीण भारत को मजबूत नहीं बनाया जा सकता। गाँव मजबूत होंगे तो देश की अर्थव्यवस्था की नींव भी मजबूत होगी।
शहरों का विकास भी जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो गाँव और शहर के बीच की दूरी लगातार बढ़ाता जाए, वह संतुलित विकास नहीं हो सकता। महानगरों में सुविधाएँ बढ़ती जाएँ और छोटे शहरों तथा गाँवों से पलायन मजबूरी बन जाए, तो हमें विकास की दिशा पर प्रश्न करना ही होगा।आज पर्यावरण भी जमीनी विकास का अनिवार्य हिस्सा है। जल, जंगल, जमीन और हवा को विकास का विरोधी मानना एक बड़ी भूल होगी। जिस विकास के कारण आने वाली पीढ़ियों के लिए पीने का पानी कम हो जाए, हवा जहरीली हो जाए और प्राकृतिक संसाधन समाप्त होते जाएँ, वह विकास लंबे समय तक टिक नहीं सकता। हमें ऐसी विकास-दृष्टि चाहिए जिसमें प्रकृति और प्रगति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, सहयोगी हों।
सह-अस्तित्व का प्रश्न केवल मनुष्यों के बीच नहीं है। मनुष्य और प्रकृति के बीच भी सह-अस्तित्व आवश्यक है। नदियाँ केवल पानी की धाराएँ नहीं, जीवन की धाराएँ हैं। जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, पर्यावरणीय संतुलन की आधारशिला हैं। पशु-पक्षी केवल जैव-विविधता का हिस्सा नहीं, बल्कि उस पारिस्थितिकी तंत्र के सहभागी हैं जिसमें मनुष्य भी शामिल है।देश की असल चिंता इसलिए केवल यह नहीं हो सकती कि हम दुनिया में कितने आगे निकल रहे हैं। यह भी देखना होगा कि हम अपने भीतर कितने साथ चल रहे हैं।
हमारे सामने एक विचित्र परिस्थिति है। तकनीक ने हमें एक-दूसरे से अभूतपूर्व रूप से जोड़ दिया है, लेकिन सामाजिक स्तर पर कई बार दूरियाँ बढ़ती दिखाई देती हैं। हम हजारों किलोमीटर दूर बैठे व्यक्ति से तुरंत संवाद कर सकते हैं, मगर अपने पड़ोसी से बात करने में संकोच करने लगे हैं। सूचना की गति बढ़ गई है, लेकिन समझ की गहराई हर जगह नहीं बढ़ी।सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है, लेकिन उसी माध्यम का दुरुपयोग अफवाह, नफरत और सामाजिक विभाजन को भी बढ़ा सकता है। इसलिए डिजिटल स्वतंत्रता के साथ डिजिटल जिम्मेदारी भी जरूरी है। हमें ऐसी सार्वजनिक संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें असहमति के बावजूद संवाद बचा रहे।
भारत की शक्ति उसकी बहुलता में है। यह बहुलता बोझ नहीं, हमारी सभ्यतागत संपदा है। यदि हम विभिन्नताओं को खतरा मानने लगेंगे तो देश की आत्मा सिकुड़ जाएगी। यदि हम विभिन्नताओं को स्वीकार करते हुए साझा नागरिकता की भावना को मजबूत करेंगे तो यही विविधता हमारी सबसे बड़ी शक्ति बनेगी।आज आवश्यकता किसी एक समुदाय, एक वर्ग या एक क्षेत्र के विकास की नहीं, बल्कि साझे विकास की है। विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और अवसरों का वितरण न्यायपूर्ण हो। किसी की प्रगति दूसरे के अधिकारों को कुचलकर न हो। कोई क्षेत्र इतना पीछे न रह जाए कि उसके लोग विकास से बाहर होने का अनुभव करें।
शांति, सह-अस्तित्व और विकास—ये तीन अलग-अलग विषय नहीं हैं। ये एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जहाँ सामाजिक शांति नहीं होगी, वहाँ निवेश और विकास का वातावरण कमजोर होगा। जहाँ आर्थिक असमानता अत्यधिक होगी, वहाँ सामाजिक तनाव बढ़ सकता है। जहाँ लोगों को न्याय और सम्मान का भरोसा नहीं होगा, वहाँ शांति भी स्थायी नहीं रह सकती।इसलिए देश को आज ऐसे विकास मॉडल की जरूरत है जिसमें अर्थव्यवस्था के साथ समाज, तकनीक के साथ संवेदना और प्रगति के साथ प्रकृति को भी बराबर महत्व मिले।हमें यह भी समझना होगा कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकार का काम नहीं है। सरकार नीतियाँ बना सकती है, संस्थाएँ खड़ी कर सकती है और संसाधन उपलब्ध करा सकती है, लेकिन समाज के भीतर विश्वास, भाईचारा और सह-अस्तित्व की संस्कृति नागरिकों को ही बनानी होगी। राजनीतिक दलों, मीडिया, शिक्षण संस्थानों, धार्मिक और सामाजिक संगठनों, साहित्यकारों तथा बुद्धिजीवियों—सभी की इसमें भूमिका है।
विद्यालयों में केवल प्रतियोगिता नहीं, सहयोग की शिक्षा भी होनी चाहिए। विश्वविद्यालयों में केवल रोजगार नहीं, लोकतांत्रिक संवाद और संवैधानिक मूल्यों की समझ भी विकसित होनी चाहिए। मीडिया को केवल सनसनी नहीं, समाज की वास्तविक समस्याओं को भी सामने लाना चाहिए। साहित्य को मनुष्य के भीतर मनुष्य को बचाने का काम करते रहना चाहिए।अंततः किसी भी राष्ट्र की सफलता का प्रश्न बहुत सरल है—क्या उसका सामान्य नागरिक सम्मान और भरोसे के साथ जीवन जी पा रहा है?
यदि किसान सुरक्षित है, मजदूर सम्मानित है, युवा आशावान है, महिला निर्भय है, बच्चा शिक्षित है, बुजुर्ग सम्मानित है और नागरिक एक-दूसरे को संदेह की नजर से नहीं, मनुष्य की नजर से देखते हैं, तो देश वास्तव में मजबूत है।हमें ऊँचाई चाहिए, लेकिन ऐसी ऊँचाई नहीं जो जमीन से हमारा रिश्ता तोड़ दे। हमें विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास नहीं जो मनुष्य को पीछे छोड़ दे। हमें शक्ति चाहिए, लेकिन ऐसी शक्ति नहीं जो समाज में भय पैदा करे। हमें प्रगति चाहिए, लेकिन ऐसी प्रगति नहीं जिसकी कीमत शांति और सह-अस्तित्व से चुकानी पड़े।देश की असल चिंता यही होनी चाहिए कि विकास की यात्रा में कोई पीछे न छूटे, शांति की राह में कोई भयभीत न हो और सह-अस्तित्व की भावना इतनी मजबूत रहे कि असहमति के बावजूद हम एक-दूसरे के साथ खड़े रह सकें।
राष्ट्र केवल उसकी सीमाओं से नहीं बनता; राष्ट्र उन करोड़ों मनुष्यों से बनता है जो उन सीमाओं के भीतर एक-दूसरे के साथ जीवन साझा करते हैं। और जिस दिन हमने इस साझे जीवन की गरिमा को विकास का सबसे बड़ा पैमाना मान लिया, उसी दिन विकास केवल आंकड़ा नहीं रहेगा बल्कि वह जीवन की गुणवत्ता बन जाएगा।