
गेहूं व जौ की तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का समापन
ब्यूरो चीफ रविसिंह किरार/ परिष्कार पत्रिका जयपुर। श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर की अधीनस्थ इकाई राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान, दुर्गापुरा, जयपुर में आयोजित गेहूं एवं जौ अनुसंधान की तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का गुरुवार को समापन हुआ। कार्यशाला के दौरान देश के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए गेहूं की 15 तथा जौ की 11, कुल 26 उन्नत किस्मों की पहचान विमोचन हेतु की गई।
गौरतलब है कि इन 26 उन्नत किस्मों में श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर द्वारा विकसित जौ की चार किस्में—आरडी 3088, आरडी 3089, आरडी 3102 एवं आरडी 3109—भी शामिल हैं। इनमें आरडी 3088 एवं आरडी 3089 छिलका रहित जौ की किस्में हैं, जबकि आरडी 3102 एवं आरडी 3109 लवणीय एवं क्षारीय क्षेत्रों के लिए उपयुक्त किस्में हैं। वहीं आरडी 3089 को दो कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए अनुमोदित किया गया है। इन किस्मों में अधिक उत्पादन क्षमता, बेहतर गुणवत्ता, रोग प्रतिरोधकता तथा विभिन्न कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप अनुकूलता जैसे गुणों को प्राथमिकता दी गई है।
65वीं अखिल भारतीय समन्वित गेहूं एवं जौ अनुसंधान परियोजना की वार्षिक कार्यकर्ता बैठक के दौरान आयोजित किस्म पहचान समिति की बैठक में विभिन्न उन्नत गेहूं एवं जौ की किस्मों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया गया। उत्पादन क्षमता, गुणवत्ता, रोग प्रतिरोधकता एवं क्षेत्रीय अनुकूलता के आधार पर नई किस्मों की अनुशंसा पर विस्तृत चर्चा की गई।
कार्यक्रम में सहायक महानिदेशक डॉ. पूनम जसोटिया ने कहा कि गेहूं एवं जौ देश की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण फसलें हैं। बदलते जलवायु परिदृश्य को देखते हुए अधिक उत्पादन देने वाली, रोग प्रतिरोधी तथा जल एवं संसाधन दक्ष किस्मों का विकास समय की आवश्यकता है। वैज्ञानिकों द्वारा विकसित नई किस्मों को शीघ्र किसानों तक पहुंचाना ही अनुसंधान की वास्तविक सफलता है।
निदेशक कृषि अनुसंधान डॉ. उम्मेद सिंह ने कहा कि कृषि अनुसंधान का मुख्य उद्देश्य किसानों की उत्पादन लागत को कम करते हुए उत्पादकता और आय में वृद्धि करना है। कार्यशाला में वैज्ञानिकों द्वारा साझा किए गए अनुसंधान परिणामों और नई किस्मों से राजस्थान सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों के किसानों को लाभ मिलेगा। उन्होंने बदलते मौसम की परिस्थितियों को देखते हुए जलवायु अनुकूल तकनीकों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई।
राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान, दुर्गापुरा के निदेशक डॉ. सुरेन्द्र सिंह ने कहा कि जयपुर में आयोजित इस राष्ट्रीय कार्यशाला ने देशभर के गेहूं एवं जौ वैज्ञानिकों को एक मंच पर अपने अनुसंधान अनुभव साझा करने का अवसर प्रदान किया। किसानों की आवश्यकताओं के अनुरूप अनुसंधान को आगे बढ़ाना तथा नई तकनीकों एवं उन्नत किस्मों को खेत तक पहुंचाना संस्थान की प्राथमिकता है।
भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल के निदेशक डॉ. रतन तिवारी ने कहा कि किस्म पहचान समिति द्वारा 15 गेहूं एवं 11 जौ की किस्मों की पहचान किसानों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इन किस्मों में अधिक उत्पादन क्षमता, गुणवत्ता, रोग प्रतिरोधकता एवं विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के अनुरूप अनुकूलता जैसे गुणों को प्राथमिकता दी गई है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों का प्रयास है कि नई किस्में शीघ्र किसानों तक पहुंचें और देश के गेहूं एवं जौ उत्पादन को नई ऊंचाइयों तक ले जाएं। मुख्य अतिथि सेवानिवृत्त पुलिस अधीक्षक श्री एन. एस. राठौड़ ने आहार में गेहूं और जौ की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने विशेष रूप से जौ के औषधीय गुणों (Medicinal Value) के महत्व को रेखांकित किया। इसके साथ ही, उन्होंने गेहूं और जौ की नवीन एवं उन्नत किस्मों को विकसित करने वाले अनुसंधान केंद्रों को बधाई दी।
कार्यशाला के संयोजक डॉ ओ पी अलावत एवं डॉ. प्रदीप सिंह शेखावत ने तीन दिवसीय कार्यशाला के सफल आयोजन के लिए सभी वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि कार्यशाला में हुए वैज्ञानिक मंथन से गेहूं एवं जौ अनुसंधान को नई दिशा मिली है। विभिन्न क्षेत्रों की समस्याओं और उनके समाधान पर हुए विचार-विमर्श से भविष्य की अनुसंधान रणनीति तैयार करने में मदद मिलेगी।
उन्होंने कहा कि इस प्रकार की राष्ट्रीय कार्यशालाएं देशभर के वैज्ञानिकों को एक-दूसरे के अनुसंधान अनुभवों से सीखने तथा किसानों की वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए सामूहिक रणनीति तैयार करने का अवसर प्रदान करती हैं।
कार्यशाला में वैज्ञानिकों ने गेहूं एवं जौ की उत्पादकता बढ़ाने, बदलती जलवायु के अनुरूप किस्मों के विकास, रोग एवं कीट प्रबंधन, गुणवत्तापूर्ण उत्पादन तथा किसानों तक नई तकनीकों के त्वरित हस्तांतरण पर विशेष जोर दिया। 26 नई उन्नत किस्मों की पहचान को तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला की प्रमुख उपलब्धि माना गया। इन किस्मों के भविष्य में किसानों तक पहुंचने से उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने के साथ देश की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।