पदम मेहता-शेखावत की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया बड़ा फैसला, अब स्कूलों में पढ़ाई जाएगी राजस्थानी भाषा

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राजस्थानी भाषा को स्कूलों में लागू कराने की मांग को लेकर पदम मेहता की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने राजस्थान सरकार को सभी सरकारी और निजी स्कूलों में राजस्थानी भाषा को एक विषय के रूप में शुरू करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने मातृभाषा आधारित शिक्षा को बच्चों के विकास के लिए जरूरी बताते हुए सितंबर तक अनुपालन रिपोर्ट मांगी है।

*राजस्थान सरकार को सभी सरकारी और निजी स्कूलों में राजस्थानी भाषा को एक विषय के रूप में शुरू करने के निर्देश दिए हैं।
*पदम मेहता व कल्याण सिहं शेखावत ने राजस्थानी भाषा की इस लड़ाई का प्रतिनिधित्व किया
*फैसले को लेकर प्रदेशभर में साहित्यकारों, शिक्षाविदों, छात्रों और राजस्थानी भाषा प्रेमियों में है ख़ुशी की लहर
*देश-विदेश के प्रवासी भी फैसले से खुश, भेज रहे सोशल मीडिया पर बधाई सन्देश
*दैनिक जलतेदीप व माणक राजस्थानी पत्रिका के प्रधान संपादक है पदम मेहता
*राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता की मांग भी अब जोरो पर

ब्यूरो चीफ रविसिंह किरार/ परिष्कार पत्रिका जयपुर / नई दिल्ली । राजस्थान में राजस्थानी भाषा को लेकर लंबे समय से चल रही मांग को अब बड़ी कानूनी मजबूती मिल गई है। दैनिक जलतेदीप व माणक राजस्थानी पत्रिका के प्रधान संपादक पदम मेहता एवं कल्याणसिहं शेखावत की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि सभी सरकारी और निजी स्कूल में राजस्थानी भाषा को एक विषय के रूप में शुरू करने की दिशा में जल्द कदम उठाए जाएं। कोर्ट ने साफ कहा कि मातृभाषा आधारित शिक्षा सिर्फ एक भावनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी से जुड़ा मामला भी है अदालत ने इस संबंध में 30 सितंबर तक अनुपालन रिपोर्ट मांगी है.

राजस्थान में लंबे समय से चल रही राजस्थानी भाषा को शैक्षणिक मान्यता देने की मांग पर आज सुप्रीम कोर्ट अहम फैसला सुना दिया है। यह मामला प्रदेश के स्कूलों में राजस्थानी भाषा की पढ़ाई शुरू करने और शिक्षकों की भाषा सूची में राजस्थानी को शामिल करने से जुड़ा हुआ है। फैसले को लेकर प्रदेशभर में साहित्यकारों, शिक्षाविदों, छात्रों और राजस्थानी भाषा प्रेमियों के बीच खुशी की लहर है। वहीँ देश-विदेश के प्रवासी भी फैसले से खुशी जाहिर कर सोशल मीडिया पर बधाई सन्देश भेज रहे है।

राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती : सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा बच्चों के मानसिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक विकास के लिए बेहद जरूरी है। अदालत ने साफ किया कि संविधान और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी शुरुआती शिक्षा स्थानीय भाषा में देने पर जोर देती है, इसलिए राज्य सरकार इस जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष सिंघवी तथा उनके सहायक अपूर्व सिंघवी ने इस केस की पैरवी जनगणना के प्रामाणिक आंकड़ों सहित हर स्तर पर राजस्थानी भाषा की महत्वतता को दर्शाते हुए बहुत ही जोरदार ढंग से की थी। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश विक्रमनाथ के साथ न्यायाधीश संदीप मेहता व विजय बिश्नोई की तीन सदस्यीय पीठ ने बड़े विस्तार से अपना फैसला सुनाया है। इस फैसले से न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा वर्ष 2020 पर घोषित राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप मातृभाषाओं में प्राथमिक शिक्षा के उद्देश्य को बल मिलेगा अपितु पूरे देश के मातृभाषा प्रेमियों को अपनी भाषा के संरक्षण के प्रति और अधिक जागरूक होने का लाभ मिलेगा।

स्कूल, उच्च शिक्षा और भर्तियों पर पड़ेगा असर : इस पूरे मामले में पदम मेहता की याचिका अहम रही, जिसमें स्कूल शिक्षा और REET परीक्षा में राजस्थानी भाषा को शामिल करने की मांग उठाई गई थी। याचिका में कहा गया था कि राजस्थान में करोड़ों लोग राजस्थानी बोलते हैं, लेकिन शिक्षा व्यवस्था में इसे पर्याप्त स्थान नहीं दिया जा रहा। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को गंभीरता से लिया और माना कि मातृभाषा को नजरअंदाज करना बच्चों के अधिकारों को कमजोर करने जैसा है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि राजस्थानी भाषा पहले से कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही है। ऐसे में यह कहना गलत होगा कि इस भाषा को शैक्षणिक मान्यता नहीं मिली है। कोर्ट ने राज्य सरकार के अब तक के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल आठवीं अनुसूची का हवाला देकर राजस्थानी को स्कूलों से दूर नहीं रखा जा सकता।

बेंच ने कहा कि संवैधानिक अधिकार केवल कागजों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। यदि बच्चों को उनकी समझ की भाषा में शिक्षा देने की बात नीति और कानून में स्वीकार की गई है, तो सरकारों को उसे लागू करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि वह अधिकारों के हनन का “मूक दर्शक” नहीं बन सकती।

फैसले से शिक्षा व्यवस्था में हो सकते हैं बड़े बदलाव : माना जा रहा है कि यदि फैसला राजस्थानी भाषा के पक्ष में आता है, तो प्रदेश के सरकारी और निजी स्कूलों में राजस्थानी विषय की पढ़ाई शुरू करने का रास्ता साफ हो सकता है। इसके साथ ही शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में भी राजस्थानी भाषा को शामिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया कि वह मातृभाषा आधारित शिक्षा के लिए व्यापक नीति तैयार करे और चरणबद्ध तरीके से स्कूलों में राजस्थानी भाषा को लागू करे। शुरुआत प्राथमिक स्तर से की जाए और बाद में इसे उच्च कक्षाओं तक बढ़ाया जाए।

यह मामला पहले राजस्थान हाईकोर्ट में भी पहुंचा था, लेकिन वहां याचिका खारिज हो गई थी। इसके बाद पदम मेहता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अब शीर्ष अदालत के इस फैसले को राजस्थानी भाषा और संस्कृति के लिए बड़ी जीत माना जा रहा है। कोर्ट ने राज्य सरकार से सितंबर तक अनुपालन रिपोर्ट मांगी है। माना जा रहा है कि इस फैसले के बाद राजस्थान में शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है और लाखों विद्यार्थियों को अपनी मातृभाषा में पढ़ाई का अवसर मिलेगा।

इस फैसले से अब राजस्थान में राजस्थानी भाषा को शैक्षिक संस्थानों में आधिकारिक स्थान मिलने की राह प्रशस्त हुई है। पदम मेहता की इस कानूनी लड़ाई को भाषाई पहचान और संस्कृति के संरक्षण की दिशा में एक बड़ी जीत माना जा रहा है।

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