जैविभा विश्वविद्यालय का 36वां स्थापना दिवस समारोह आयोजित

Spread the love

विकास में कभी संतोष नहीं करें, बल्कि अधिक विकास व ऊंचाई के प्रयास जारी रखे जाएं- आचार्यश्री महाश्रमण

लाडनूं। जैन विश्वभारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय) के 36वें स्थापना दिवस समारोह का आयोजन शुक्रवार को सुधर्मा सभा में अनुशास्ता आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में एवं कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ की अध्यक्षता में किया गया। इस अवसर पर आचार्यश्री महाश्रमण ने ज्ञान प्राप्ति के साथ संस्कारवान बनने और आत्मनिर्भरता की ओर बढने की आवश्यकता बताते हुए जैन विश्वभारती संस्थान को इस दिशा में एक विशिष्ट संस्थान बताया। उन्होंने कहा कि जैन विश्व भारती और जैन विश्वभारती संस्थान दोनों को एक साथ देख रहे हैं, एक संयुक्त परिसर में देख रहे हैं। ऐसा संस्थान अन्यत्र नहीं मिलेगा, जहां शिक्षा भी है, साधना भी है, संन्यासियों का निवास भी है, चिकित्सा भी है और मुमुक्षुओं का प्रशिक्षण भी है। उन्होंने ज्ञान को मोक्ष का मार्ग बताया और चेतना के भीतर से उठने वाले ज्ञान को आत्मोत्थ ज्ञान बताते हुए कहा कि यह अतीन्द्रिय ज्ञान होता है। शिक्षण संस्थान से मिलने वाले ज्ञान को उन्होंने इन्द्रियों द्वारा पुस्तकों आदि से प्राप्त ज्ञान बताया और कहा कि सारस्वत साधना एकाग्रता और संयम से होती है। बाह्य सुखों में रस लेने से ज्ञान प्राप्ति में कमी रह जाती है। उन्होंने ज्ञान प्राप्ति को एक तपस्या और साधना बताते हुए कहा कि ज्ञान को कंठस्थ किया जाने की भी परम्परा रही है। उन्होंने आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ की ज्ञान साधना का उदाहरण दिया। आचार्य महाश्रमण ने कहा कि इस जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय से जैन शासन के विभिन्न संन्यासी, गृहस्थ सभी ज्ञान प्राप्ति कर रहे हैं। ज्ञान के साथ साधना भी पुष्ट रहनी चाहिए। उन्होंने अर्थ-प्राप्ति को गृहस्थों के लिए आवश्यक बताते हुए कहा कि अर्निंग के लिए लर्निंग होनी चाहिए, लेकिन जीवन में अच्छे संस्कार भी बने रहने चाहिए। अनुशास्ता ने विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ के 10 साल के कार्यकाल के विकास की सराहना करते हुए कहा कि विकास कार्य में कभी संतोष नहीं करना चाहिए, बल्कि और अधिक विकास के प्रयास जारी रखने चाहिए। उन्होंने संस्थान को और अधिक ऊंवाई पर ले जाने तथा अधिक उत्थान के लिए प्रेरित किया। संस्थान के अहिंसा व शांति विभाग के लिए अुशास्ता आचार्य महाश्रमण ने वर्तमान युद्ध की स्थिति को रोके जाने के लिए कोई रास्ता निकालने और सुझाव तैयार करके भेजे जाने के लिए भी सलाह प्रदान की।
दस सालों में विश्वविद्यालय पूर्ण स्वायत बना
कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ ने अपने सम्बोधन में जैन विश्वभारती संस्थान के विगत 35 वर्षों के इतिहास का संक्षिप्त विवरण उल्लेख करते हुए अब तक रहे सभी कुलपतियों के कार्यकाल की विशेषओं का उल्लेख किया और वर्तमान स्थिति को आगकल प्रस्तुत किया। प्रो. दूगड़ ने कहा कि आज संस्थान पूर्ण रूप से स्वायत्त हो चुका है। विगत दस सालों में सरकार से संस्थान विकास के लिए मिलने वाला धन पंचवर्षीय योजनाओं के साथ ही बंद हो चुका है। अब तक के सर्वाधिक विद्यार्थी, सर्वाधिक फैकल्टी सदस्य वर्तमान में संस्थान के हैं। संस्थान को संस्कृति मंत्रालय और शिक्षा मंत्रालय से शोध के लिए 35 लाख की राशि मिली है। संस्थान में कम्प्यूटराईजेशन और डिजीटलाईलेशन का काम हुआ है। संस्थान के काम को नियमित ओर अनुशासित करने के लिए 20 नवीन नीतियों का निर्माण किया गया है। नेचुरोपैथी काॅलेज का निर्माण हुआ है। राजस्थानी विभाग, प्राकृत विभाग और पांडुलिपियों के संरक्षण व डिजीलाइजेशन का विशष कार्य हुआ है। जैन जीवन शैली, जैन वास्तु, जेन ज्योतिष आदि नए पाठ्यक्रमों का निर्माण किया जाकर उन्हें शुरू किया गया है। राजकीय मूल्यांकन संस्थानों से लगभग हर वर्ष संस्थान का मूल्यंाकन करवाया गया है। संस्थान में पहली बार शिक्षकों द्वारा नवीन पैटेंट करवाने का विशेष कार्य हुआ है। अब तक 7-8 पैटेंट करवाए जा चुके हैं। उनका उपयोग बिना अनुमति के कोई भी नहीं कर पाएगा।
हजारों साधु-साध्वियों ने प्राप्त की उच्च शिक्षा
जैन विश्व भारती के अध्यक्ष अमरचंद लूंकड़ ने इस अवसर पर कहा कि जैन विश्व भारती संस्थान की दूरस्थ शिक्षा से प्रतिवर्ष हजारों लोग लाभानिवत हो रहे हैं। संस्थान अपनी स्थापना के उद्देश्यों को पूरा करने में सफल रहा है। पूरे देश में यह अपनी अलग पहचान रखता है। विदेशों में तक इसकी ख्याति पहुंची है। संस्थान के आध्यात्मिक पर्यवेक्षक मुनिश्री कुमार श्रमण ने कहा कि गुरूदेव आचार्य तुलसी के स्वप्न के अवदान के रूप में संस्थान सम्पूर्ण जैन समाज के लिए गौरव है। हजारों जैन साधु-साध्वियों ने यहां से बीए, एमए, पीएचडी की शिक्षा प्राप्त की है। इसमें सभी सम्प्रदायों के साधु सम्मिलित हैं। संस्थान की जैन एकता की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह जैन धर्म की प्रभावना के लिए निरन्तर प्रगतिशील है। उन्होंने कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ की सेवाओें की सराहना करते हुए बताया कि अपने 10 सालों के कार्यकाल में उन्होंने संस्थान को अलग पहचान प्रदान की। भारतीय ज्ञान परम्परा में संस्थान आगे बढा है। उन्होंने भी अहिंसा एवं शांति विभाग को वर्तमान युद्ध के समय में युद्ध-विराम की दिशा में उचित प्रयास किए जाने की सलाह दी। मुख्य मुनिश्री ने कहा कि इस विश्वविद्यालय को एक से बढ कर एक अनुशास्ता मिल हैं। यह विश्व का पहला विश्वविद्यालय है, जिसमें अनुशास्ता के रूप में जैन आचार्य हैं। विभिन्न सम्प्रदायों के साधु-साध्वियां यहां से उच्च शिक्षित हैं और वे गुरूदेव के समक्ष आकर इसका उल्लेख और प्रशंसा करते हैं।
विभिन्न सम्मानों से नवाजा गया : स्थापना दिवस समारोह में श्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए शिक्षकों, कार्मिकों व विद्यार्थियों का सम्मान भी किया गया। इसमें जीवन गौरव सम्मान (लाईफ टाईम अचीवमेंट अवार्ड) से भारतीय ज्ञान परम्परा के अतिभू प्रचेता प्रो. जिनेन्द्र कुमार जैन को शिक्षा, संस्कृति व संस्कारों के लिए और वितीय प्रबंधन के मर्यादा रक्षक राकेश कुमार जैन को उनकी कर्तव्यनिष्ठा व श्रमपरायणता के लिए प्रदान किया गया। विद्यानिधि सम्मान प्रमुख शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए डा. लिपि जैन, स्नेहा शर्मा, डाॅ. रविन्द्र सिंह राठौड़ व डाॅ. सत्यनारायण भारद्वाज को प्रदान किया गया। उत्कृष्ट सेवाओं, समर्पण और संस्थान के विकास में सहायक के रूप में कार्य करने पर ‘श्रेष्ठ सेवा सम्मान’ उपकुलसचिव अभिनव स्वरूप सक्सेना, उपकुलसचिव दीपाराम खोजा व सहायक कुलसचिव पंकज भटनागर को प्रदान किया गया। संस्थान के प्रशासनिक स्टाफ के प्रकाश गिड़िया, पवन सैन, रमेश सोनी, राजेन्द्र बागड़ी, शरद कुमार जैन, मयंक जैन, मनीषा चैहान च जगदीश सिंह शेखावत को ‘कौशल निधि सम्मान’ प्रदान किया गया। इसी प्रकार चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों में बाबूलाल सांखला, सुरेश कुमार पारीक, सुनील कुमार सिंह, अनिल सूर्या व मुन्ना हरिजन को ‘श्रमनिधि सम्मान’ नवाजा गया। ‘बेस्ट अवार्ड’ से सर्वश्रेष्ठ स्नातक छात्रा के रूप में ट्विंकल भंसाली व कोमल प्रजापत को तथा सर्वश्रेष्ठ स्नातकोत्तर छात्रा में रूप में संगीता जानूं और कार्तिक कुल्हर को प्रदान किया गया।
तीन पुस्तकों का किया विमोचन : समारोह के दौरान तीन पुस्तकों का विमोचन भी आचार्य महाश्रमण को पुस्तक की प्रतियां प्रदान करते हुए किया गया। इनमें महावीरराज गेलड़ा की पुस्तक ‘जैन आगमों का सामान्य ज्ञान-भाग 3’ और प्रो. लक्ष्मीकांत व्यास की दो पुस्तकों राजस्थानी भाषा की ‘गीतां तणो न भांजै गोख’ एवं हिंदी पुस्तक ‘धरोहर के आयाम’ का विमोचन हुआ। कार्यक्रम का प्रारम्भ मुमुक्षु बहनों के मंगलाचरण से किया गया। छात्राओं ने इस अवसर पर विश्वविद्यालय की विशेषताओं का काव्य व संगीत युक्त सुमधुर गान किया। समारोह में अतिथियों के रूप में जैन विश्व भारती के अध्यक्ष अमरचंद लूंकड़ व आचार्य महाश्रमण योगक्षेम वर्ष प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष प्रमोद बैद थे। अन्य विशिष्ट लोगों में भागचंद बरड़िया, जैन विश्व भारती के मंत्री सलिल लोढा, पूर्व अध्यक्ष धर्मचंद लूंकड़, प्रवीण बरड़िया, राजेन्द्र खटेड़, अभय जैन, नरेन्द्र भोजक, शिम्भुसिंह जैतमाल आदि उपस्थित रहे। मुनिवृंद, संकाय सदस्य, समस्त कार्मिकगण एवं विद्यार्थीगण इस कार्यक्रम में उपस्थित रहे। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *