ओउमाश्रय में सावित्री वाई फूले के जन्मदिन पर समरसता यज्ञ एवं मंथन ।
ब्यूरो चीफ रविसिंह किरार/ परिष्कार पत्रिका जयपुर। नारी शिक्षा एवं सामाजिक समरसता के लिए संघर्ष करने ऋषि दयानंद के विचारों वाली सावित्री वाई फूले की जयंती पर ओउमाश्रय सेवा धाम में समरसता यज्ञ एवं ‘ सामाजिक समरसता और वर्तमान परिपेक्ष्य की चुनौती” विषयक परिचर्चा हुई।
संचालक देवेश गोयल ने बताया कि इस अवसर पर वैदिक चिंतक ओउमाश्रय संस्थापक यशपाल यश ने समरसता यज्ञ में आहुतियां दिलवाई।
चर्चा में यश ने कहा कि आज मनुस्मृति जो विधि शिक्षा के इंडियन लीगल हिस्ट्री विषय में प़ाचीन कानून के स्रोतों के रूप में वताई जाती है की प्रतिष्ठा तथा भारत की अखंडता वचाना वढी चुनौती है।
यश ने कहा कि इस का मुख्य कारण मूल एवं शुद्ध मनुस्मृति में मिलावट कर वर्ण व्यवस्था कर्म के स्थान पर जन्मगत जाति पांति है।यश ने कहा कि गीता में भगवान कृष्ण ने चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं गुण कर्म विभागश कहा है। शास्त्र भी जन्मना जायते शूद्रा संस्कारात द्विज उच्यते कहते हैं यानि जन्म से सभी समान है शिक्षा दीक्षा से उनका वर्ण निर्धारित होता है।यश ने भारत सरकार से मांग की है कि विद्वानों की धर्म संसद बनाकर शुद्ध मनुस्मृति के विचारों को स्पष्ट रूप से स्थापित कराएं ताकि भारत की अखंडता और मनुस्मृति का सम्मान वना रहे। मनुस्मृति कहती है कि जहां नारी सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं।
यश ने कहा कि सावित्री वाई फूले ने ऋषि दयानंद की तरह स्वाभिमान से जीने के लिए पढ़ाई करो शिक्षा ही महिलाओं का सच्चा आभूषण है कहा। यश ने प़क्षिप्त मिलावटी मनुस्मृति को राजनीतिक हथियार बनाने जलाने पर चिंता व्यक्त की। इस अवसर पर अनेक गणमान्य लोग मौजूद रहे तथा पिछड़े वर्ग के बच्चों ने आहुतियां दी।