आरजीएचएस योजना में गंभीर वित्तीय संकट, व्यवस्थाएँ चरमराई — सरकार इंश्योरेंस मोड की ओर बढ़ती हुई

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ब्यूरो चीफ रविसिंह किरार/ परिष्कार पत्रिका जयपुर। राजस्थान राज्य सरकार की फ्लैगशिप आरजीएचएस (राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम), जो वर्ष 2021 में पेंशनर्स, कर्मचारियों एवं उनके परिवारजनों के लिए शुरू की गई थी, वर्तमान में गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रही है। बजटीय योजना एवं खर्चों के यथार्थ आकलन में विफल रहने के कारण राज्य सरकार भुगतान व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित करने में असफल रही है। परिणामस्वरूप अस्पतालों, डायग्नोस्टिक केंद्रों एवं दवा विक्रेताओं के ₹2200 करोड़ से अधिक के भुगतान पिछले 8–9 महीनों से लंबित हैं।
स्थिति यह है कि सेवा प्रदाताओं को समय पर भुगतान नहीं मिलने के बावजूद राज्य सरकार एवं प्रशासन गड़बड़ियों का आरोप उन्हीं पर लगाकर अपनी जवाबदेही से बचने का प्रयास कर रहे हैं। दूसरी ओर, कर्मचारियों, पेंशनर्स एवं उनके परिवारजनों को मासिक कटौती के बावजूद सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है, जिससे उन्हें निजी खर्च पर उपचार कराना पड़ रहा है।
राज्यभर के आरजीएचएस एम्पैनल्ड अस्पतालों ने पूर्व में भी कई बार आंदोलन किया है। सितंबर 2025 में सेवाएँ आंशिक रूप से बंद की गई थीं, और अब 13 अप्रैल 2026 से पुनः योजना के बहिष्कार की घोषणा की गई है। इसी क्रम में केमिस्ट एसोसिएशन द्वारा भी विरोध प्रदर्शन किया गया है। इसके अतिरिक्त, कर्मचारी संगठनों एवं पेंशनर संघों ने भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
सूत्रों के अनुसार, राज्य सरकार इस योजना में सुविधाओं में कटौती करते हुए इसे इंश्योरेंस मोड पर स्थानांतरित करने की दिशा में अग्रसर है, जिससे सभी हितधारकों में असंतोष और बढ़ गया है।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) राजस्थान एवं अन्य चिकित्सीय संगठनों द्वारा समय-समय पर सरकार को कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं, जिनमें मानकीकृत प्रक्रिया, न्यूनतम डॉक्यूमेंट प्रोटोकॉल, ओपीडी/आईपीडी कैपिंग, को-पेमेंट, स्टैंडर्डाइजेशन एवं कैटेगराइजेशन जैसे सुधारात्मक उपाय शामिल हैं। किंतु प्रशासन इन सुझावों को लागू करने में विफल रहा है।
आईएमए राजस्थान के अध्यक्ष डॉ. महेश शर्मा के अनुसार, वर्तमान में वार्ताएँ जारी हैं, परंतु वित्त विभाग, स्वास्थ्य विभाग एवं आरजीएचएस एजेंसी के बीच समन्वय की कमी तथा विभिन्न समितियों में निर्णय प्रक्रिया के उलझाव के कारण कोई ठोस निर्णय नहीं हो पा रहा है। उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की है कि इस विषय में तत्काल हस्तक्षेप करते हुए मुख्य सचिव, मुख्यमंत्री सचिव, वित्त सचिव एवं चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सचिव को शामिल कर एक उच्च स्तरीय समिति गठित की जाए, ताकि इस योजना का नीतिगत समाधान सुनिश्चित किया जा सके।
आईएमए राजस्थान के सचिव डॉ. एन. के. अग्रवाल ने बताया कि योजना से जुड़े छोटे-बड़े सभी अस्पताल गंभीर संकट में हैं। सीमित एवं असंतुलित एम्पैनलमेंट, दूरदराज के अस्पतालों की उपेक्षा तथा कम पैकेज रेट्स ने स्थिति को और खराब किया है। उन्होंने यह भी बताया कि अक्टूबर 2025 में सीजीएचएस की दरों में संशोधन होने के बावजूद राजस्थान में अभी भी 2014 की दरें लागू हैं, जिससे अस्पतालों के लिए संचालन करना कठिन होता जा रहा है।
आईएमए राजस्थान का स्पष्ट मत है कि जब तक राज्य सरकार द्वारा उच्च स्तरीय हस्तक्षेप कर नीतिगत सुधार नहीं किए जाते, तब तक इस योजना का सुचारू संचालन संभव नहीं है। इसी कारण योजना के बहिष्कार का निर्णय जारी रहेगा।
आईएमए राजस्थान राज्य के सभी कर्मचारियों, पेंशनर्स एवं उनके परिवारजनों से इस कठिन समय में सहयोग एवं धैर्य बनाए रखने की अपील करता है। साथ ही, वर्तमान असुविधाओं के लिए खेद व्यक्त करते हुए आश्वस्त करता है कि राज्यभर के चिकित्सक बेहतर से बेहतर चिकित्सा सेवाएँ प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

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