

ब्यूरो चीफ रविसिंह किरार/ परिष्कार पत्रिका लाडनूं। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कहा है कि जैन धर्म जीवन जीने की कला है। इसमें पांच महाव्रतों का महत्व अधिक है। जिनमें अहिंसा का संदेश पूरे विश्व में प्रभावी सिद्ध होगा। यह मानव मात्र को दिशा देने वाला सिद्धांत है। जैन धर्म प्रकृति के साथ समन्वय बनाकर चलने के लिए प्रेरित करता है। वे यहां जैन विश्व भारती स्थित सुधर्मा सभा का लोकार्पण करने के बाद आयोजित समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। मुख्यमंत्री ने आचार्यश्री महाश्रमण के लाडनूं पदार्पण को पूरे प्रदेश के लिए गौरव की बात बताया और कहा कि अचार्य महाश्रमण लोगों को दिशा प्रदान करते हैं। ये युवाओं को संस्कृति और जागरण का मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने महाश्रमण की साधना और ज्ञान को मानव मात्र के लिए समर्पित बताते हुए कहा कि उन्होंने तो अपना पूरा जीवन ही समर्पित किया है। उन्होंने जैन धर्म की प्राचीन परम्पराओं को आधुनिकता से जोड़ कर समाज को नई दिशा दी है।
जैन विश्व भारती से मिलती है पूरी दुनिया को ऊर्जा
मुख्यमंत्री शर्मा ने कहा कि जैन विश्व भारती को धर्म, शिक्षा और संस्कार को व्यावहारिक रूप देने में कामयाबी मिली है। मुख्यमंत्री ने बताया कि वे तीन-चार साल पहले यहां दो दिन रहे थे। इन दो दिनों में उन्हें यहां के वातावरण और ऊर्जा को अनुभव किया। इस ऊर्जा का अपने आप में बहुत ही महत्व है। यहां आने वाले हर व्यक्ति को यहां नई ऊर्जा मिलती है और यहां से पूरी दुनिया को ऊर्जा मिलेगी। उन्होंने राजस्थान को आध्यात्मिक व सांस्कृतिक विशेषताओं का गढ कहा और बताया कि यहां की जनता धर्म के माग्र पर चल कर जीवन को पवित्र करेगी। देश को विश्वगुरू बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि हम सबकी जिम्मेदारी है कि इस मान्यता को और आगे बढा कर प्रतिस्थपित करें और विश्व में सबको रास्ता दिखाने वाले बनंे।
अहिंसा, संयम और तप से होता है हर व्यक्ति का मंगल और कल्याण
इस अवसर पर तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें अधिष्ठाता आचार्यश्री महाश्रमण ने अपने प्रवचन में सभी धर्मों को मंगल बताते हुए कहा कि अहिंसा, संयम और तप से व्यक्ति मात्र को मंगल और कल्याण होता है। उन्होंने योगक्षे वर्ष का अर्थ बताते हुए कि अज्ञात को प्राप्त करना और जो ज्ञात है, उसकी रक्षा करना ही योगक्षेम है। इसके लिए एक वर्ष का समय तय किया गया है। 6 फरवरी 2026 को उनका प्रवेश हुआ है और 24 फरवरी 2027 को उनका यहां से प्रस्थान होगा। उन्होेंने जानकारी दी कि 1989 मे आचार्य तुलसी क ेसमय यहां योगक्षेम वर्ष आयोजित किया गया था, उसके करीब 36-37 साल बाद यह योगक्षेम वर्ष की पुनरावृति होने जा रही है। लाडनूं को आचार्य तुलसी की जन्मस्थली बताते हुए महाश्रमण ने कहा कि अपने युग के धर्माचार्य, जैनाचार्य, तेरापंथ आचार्य होने के साथ ही मानव मात्र के लिए आचार्य तुलसी ने काम किया था। अणुव्रत के माध्यम से उन्होंने जन-जन का उद्धार किया। आचार्य महाप्रज्ञ ने अहिंसा यात्रा के द्वारा जन-जन को अहिंसा, नैतिकता आदि मूल्यों को अपनाने का संदेश दिया था। उन्होंने लाडनूं को तेरापंथ धर्मसंघ का सबसे श्रेष्ठ और प्रथम क्षेत्र बताया। आचार्य श्री महाश्रमण ने शुक्रवार को ही प्रातः जैन विश्व भारती में मंगल प्रवेश किया था। उन्होंने रात्रि विश्राम भाग्यश्री में किया था, जहां से शुक्रवार प्रातः प्रस्थान करके वे पदयात्रा करते हुए भारी जुलूस के साथा जैन विश्व भारती पहुंचे। यहां उनका करीब एक वर्ष पर्यंत योगक्षेम वर्ष प्रवास रहेगा।
विश्वविद्यालय करे विश्व के सम्मुख अनूठा कार्य
राजस्थान पत्रिका समूह के प्रधान सम्पादक डाॅ. गुलाबचंद कोठारी ने इस अवसर पर अपने सम्बोधन में आचरण को सबसे महत्वपूर्ण मानते हुए आचरण को धर्म व संस्कृति की देन बताया। उन्होंने वर्तमान सता को धर्म व संस्कृति के नाम से खड़ी होना बताया तथा कहा कि स्वयं को धर्मनिरपेक्ष कहने वाली दीवारें इनकी राह के बीच में खड़ी हो रही हैं। उन्होंने जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय के कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि इसका लक्ष्य होना चाहिए कि यह विश्व के सम्मुख कुछ अनूठा कार्य करे।
शिलालेख का अनावरण एवं नगर पालिका ने किया अभिनन्दन
कार्यक्रम के दौरान नगर पालिका लाडनूं की तरफ से पालिकाध्यक्ष रावत खां ने आचार्य श्री महाश्रमण का अभिनन्दन किया। उनके द्वारा प्रदत्त अभिनन्दन पत्र का वाचन राजकुमार चैरड़िया द्वारा किया गया। इससे पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने सुधर्मा सभा प्रवंचन पांडाल का लोकार्पण शिलालेख का अनावरध करके किया। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि गुलाबचंद कोठारी, सुधर्मा सभा के निर्माता भागचद बरड़िया व प्रवीण बरड़िया उपस्थित रहे। इस अवसर पर आचार्य श्री महाश्रमण योगक्षेम वर्ष प्रवास समिति के अध्यक्ष प्रमोद बैद, जैन विश्व भारती के अध्यक्ष अमर चंद लूंकड़, जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ व राजेन्द्र कठोतिया ने अपने सम्बोधन में पिछले 14 महिनों से जैन विश्व भारती के नवीनीकरण व सौंदर्यकरण कार्य की प्रगति के बारे में विवरण प्रस्तुत किया। सरकार व नगर निकाय द्वारा दिए गए सहयोग का उल्लेख भी किया। कुलपति प्रो. दूगड़ ने जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय को अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण के अनुशासन का साक्षात् स्वरूप बताया और कहा कि यह अपने ध्येय वाक्य ‘णाणं सार मायारो’ अर्थात् ज्ञान का सार आचार है, को साकार करता है और अनुशास्ता के अनुशासन को जीवंत बना रही है। इस अवसर पर साध्वी प्रमुखा विश्रुत विभा, मुनिश्री महावीर कुमार, साध्वीवर्या सम्बुद्धयशा तथा अन्य विभिन्न जैन मुनि-साध्वी, जैन विश्व भारती के पदाधिकारीगण, जैविभा विश्वविद्यालय के शिक्षक, विद्यार्थी आदि एवं बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं एवं आमजन मौजूद रहे।