
परिष्कार पत्रिका जयपुर। भारतीय ज्ञान परम्परा का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। यह वेदों, पुराणों, उपनिषदों के रूप में अपने विचारों और ज्ञान से सम्पूर्ण मानवता का पथ प्रदर्शन करता रहता है। इस परम्परा ने साहित्य, कला, विज्ञान, धर्म, संस्कृति इत्यादि में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसी परम्परा के आधुनिक भारतीय साहित्य के एक अद्वितीय स्तंभ छायावाद के प्रतिनिधि कवि एवं साहित्यकार श्जयशंकर प्रसाद है। जयशंकर प्रसाद भारतीय ज्ञान परम्परा के सच्चे प्रतिनिधि कवि हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि भारतीय साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है बल्कि यह मानवता को दिशा दिखाने वाला एक दार्शनिक भी है। प्रसाद की रचनायें भारतीय परम्परा और आधुनिकता का संगम है जो हमें अपनी जड़ों से जुडऩे और भविष्य की ओर बढऩे की प्रेरणा देती है। उनका साहित्य हमें हमारी संस्कृति पर गर्व करना सिखाता है। उनका मानना था कि भारतीय संस्कृति एवं साहित्य ज्ञान का भण्डार है, जो न केवल हमारी प्राचीन धरोहर है बल्कि हमारी पहचान भी है। भारतीय ज्ञान परम्परा भौतिक और आध्यात्मिक जीवन के बीच संतुलन स्थापित करने की बात करती है।
इस परम्परा में कविताए नाटक और कथा के माध्यम से जीवन और मानवता के मूलभूत प्रश्नों पर चिंतन किया गया है। यह परम्परा आधुनिक काल में भी साहित्यिक और सांस्कृतिक रूप में प्रासंगिक उपयोगी बनी रही हैं। इस परम्परा को जयशंकर प्रसाद जैसे साहित्यकारों ने नई दिशा प्रदान की है।
भारतीय ज्ञान परम्परा की विशेषताएं : भारतीय ज्ञान परम्परा की यदि बात की जाए तो यह हम पाते है कि इसने सदैव ही सृष्टि के गूढ़ रहस्यों को जानने-समझने का प्रयास किया है। यह परम्परा भौतिक और आध्यात्मिक जीवन के बीच संतुलन स्थापित करने की बात करती है। भारतीय ज्ञान परम्परा एक विरासत है, जो हजारों सालों से चली आ रही है। यह परम्परा अनुशासन, आत्मनिर्भरता और सभी के लिए सम्मान जैसे मूल्यों पर जोर देती है। इस परम्परा में लौकिक और पारलौकिक कर्म, धर्म, भोग, त्याग का अद्भुत समन्वय है। इसमें ज्ञान-विज्ञान, जीवन-दर्शन, अनुभव-अवलोकन, प्रयोग-विश्लेषण इत्यादि शामिल है।
भारतीय ज्ञान परम्परा की अगर साहित्य में बात की जाए तो रामायण, महाभारत, वेद-पुराण, उपनिषद आदि ग्रंथ मानव के धार्मिक, सांस्कृतिक एवं दार्शनिक मार्गदर्शन के स्त्रोत रहे हैं। इस परम्परा को आधुनिक काल में भी समृद्ध और प्रासंगिक बनाये रखने में जयशंकर प्रसाद ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भारतीय ज्ञान परम्परा में जयशंकर प्रसाद का योगदान : जयशंकर प्रसाद 1889-1937 हिन्दी साहित्य के छायावादी युग 1918 से 1937 ई के एक प्रमुख स्तम्भ थे। उन्होंने अपनी कृतियों में भारतीय ज्ञान परम्परा को आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत किया है। उनकी रचनाएँ इस बात का प्रमाण है कि भारतीय दार्शनिकता और जीवन मूल्य साहित्य के माध्यम से कैसे जनमानस को प्रेरित कर सकते है। प्रसाद ने तेरह नाटकों की सर्जना की है। यदि इन नाटकों में ज्ञान एवं ऐतिहासिकता की बात करें तो कामना और एक घूंट को छोडक़र लगभग सभी नाटक मूलत: इतिहास पर आधृत है। इसमें महाभारत से लेकर हर्ष तक के समय का वर्णन किया गया है। स्कंद गुप्त, चंद्र गुप्त, जन्मेजय का नागयज्ञ, अजातशत्रु इत्यादि नाटक भारतीय ऐतिहासिक ज्ञान परम्परा की वाटिका के पुष्पों की भाँति है, जो सदैव अपनी ज्ञान रूपी सुगंध से हमें सुवासित करते रहते हैं। प्रसाद के नाटकों में सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना इतिहास की भित्ति पर संस्थित हैं। प्रसाद ने अपने दौर के पारसी रंगमंच की परम्परा को अस्वीकारते हुए भारत के गौरवमय अतीत के अनमोल चरित्रों को सामने लाते हुए अविस्मरणीय नाटकों की रचना की।
यदि काव्य की बात करें तो जयशंकर प्रसाद ने झरना, आँसू, लहर, प्रेम पथिक, कामायनी सहित कई बेहतरीन काव्य संग्रह दिये है जो भारतीय ज्ञान परम्परा के कोष में एक-एक मोती की भाँति प्रकाशमान है। कामायनी पन्द्रह सर्गों में विभाजित एक महाकाव्य है। इस कृति ने प्रसाद को अमर बना दिया। इस कविता संग्रह में मानव सृष्टि के आदि से लेकर अब तक के जीवन का मनोवैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक विकास वर्णित है। साथ ही इसमें मानवता के कल्याण के लिए आनंदवाद और समरसता की स्थापना की गई है। प्रसाद के काव्य का प्रमुख तत्व प्रेम और सौन्दर्य की अनुभूति है। इसी कारण जयशंकर प्रसाद ने अपने काव्य में मनुष्य, प्रकृति और ईश्वर तीनों के सौन्दर्य का आकर्षक चित्रण किया है। जयशंकर प्रसाद ने न सिर्फ बेहतरीन नाटक व काव्य दिये अपितु कहानियाँ भी भारतीय ज्ञान परम्परा कोष में मणियों की तरह अपनी ज्ञान और गौरव की आभा बिखेरते हुए नजर आती है। जयशंकर प्रसाद के पाँच कहानी संग्रहों छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी तथा इन्द्रजाल इत्यादि में उनकी लगभग सत्तर 70 कहानियाँ संग्रहित है। इन कहानियों में मानव जीवन के प्रत्येक पहलुओं को प्रदर्शित किया गया है। इनकी कहानियाँ समाज की समस्याओं, स्वतंत्रता, न्याय, जाति-धर्म, स्त्री सम्मान, प्रेम-त्याग, समर्पण जैसे मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करती है। साथ ही इनकी कहानियों में मानवीयता, आध्यात्मिकता, धार्मिकता को भी प्रमुखता दी गई है। प्रसाद की कहानियों को पढ़ कर पाठकों को मन की शांति, अन्तरंग सुन्दरता आध्यात्मिक ज्ञान का अनुभव होता है।
जयशंकर प्रसाद की रचनाओं की विशेषता : प्रसाद स्वयं कई विशेषताओं से परिपूर्ण व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने भारतीय ज्ञान परम्परा में अविस्मरणीय कृतियाँ देकर स्वयं को भारतीय साहित्य में अमर बना लिया। उनकी काव्यगत कुछ ऐसी विशेषताएँ है जो उन्हें हिन्दी साहित्य जगत में अन्य साहित्यकारों से भिन्न एवं उच्च स्थान परविराजमान करती है। जैसे – नाटकों में भारतीय इतिहास और गौरव-प्रसाद के नाटक जैसे. चन्द्रगुप्त, ध्रूवस्वामिनी, स्कंदगुप्त आदि भारतीय इतिहास और ज्ञान परम्परा की महानता को उजागर करते है। इन नाटकों में ऐतिहासिक घटनाओं के वर्णन के साथ-साथ भारत की सांस्कृतिक विरासत का संदेश भी है। इन नाटकों में सांस्कृतिक, आत्मनिर्भरता एवं देशभक्तिकी भावना का चित्रण है।
कविता में दार्शनिकता एवं मानवता, जयशंकर प्रसाद की कविताओं में भारतीय दर्शन का चित्रण किया गया है। कामायनी में वेदांत और सांख्य दर्शन के विचार प्रस्तुत किए गये है।
श्रद्धा और मनु के माध्यम से मानव जीवन के संघर्ष, प्रेम और संतुलन को दर्शाया गया है।
कहानियों में भारतीय संस्कृति का गौरव एवं संरक्षण : प्रसाद की कहानियों एवं उपन्यास भारतीय समाज और संस्कृति को गहराई से दर्शाते है। इनकी कहानियाँ न केवल मनोरंजक हैं, बल्कि उनमें भारतीय जीवन मूल्यों का संरक्षण भी है। पुरस्कार, छोटा जादूगर नामक कहानियाँ इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। स्पष्ट है कि जयशंकर प्रसाद ने भारतीय ज्ञान परम्परा को न केवल अपने साहित्य में जीवित रखा बल्कि उसे आधुनिक विचारधाराओं के साथ भी जोड़ा। इन्होंने अपनी रचनाओं में दर्शाया है कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर आज भी प्रासंगिक है और उसे अपनाकर हम अपने जीवन को समृद्ध बना सकते है। प्रसाद ने साहित्य को एक ऐसा माध्यम बनाया है जो हमें हमारी संस्कृति को समझने और भविष्य के लिए प्रेरणा लेने में सहायक है। भारतीय ज्ञान परम्परा और जयशंकर प्रसाद का योगदान आज भी हमें प्रेरित करता है और आने वाले समय में भी साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में मार्गदर्शन करता रहेगा।
शोधार्थी
माया पचेरवाल व्याख्याता
हिंदी विभाग,
भाषा साहित्य भवन,
गुजरात विश्वविद्यालय,
अहमदाबाद गुजरात 380009