घर से भागकर शादी और प्यार : बच्चों ने माता-पिता से छीन लिया विवाह का अधिकार

Spread the love

योगेन्द्र सैनी / परिष्कार पत्रिका जयपुर। आजकल युवाओं में अपनी पसंद से शादी करने का चलन बढ़ता ही जा रहा है। प्राचीन समय से ही हमारी संस्कृति में लडक़ी को उसकी पसंद से वर चुनने का अधिकार दिया गया है। आज भी सामान्यत: अधिकांशत: ऐसा ही है माता-पिता जब लडक़ी के लिए कोई लडक़ा पसंद करते हैं या लडके के लिए लडक़ी पसंद करते हैं तो उसे दिखाया जाता है, बातचीत करने का अवसर दिया जाता है और उसकी हां होने पर ही सामान्यत: शादी की जाती है। लेकिन समाज में ऐसा माहौल बना रखा है, जैसे माता-पिता लडक़ी की इच्छा के विरुद्ध उसकी शादी कर रहे हैं। इसी कारण लडक़े-लड़कियों को यह लगता है कि हम अपनी इच्छा से शादी करेंगे और वह अपनी इच्छा को सर्वोपरि मानते हुए अपने प्रेमी-प्रेमिका के साथ घर से भाग कर शादी करने में भी कोई संकोच नहीं करतें है। शादी के बाद क्या होगा क्या नहीं होगा। इस पर वह किसी प्रकार से विचार नहीं करती है।
युवा जब घर से भाग कर जब शादी करतें है तो क्या-क्या छीन कर ले जाती है यह शायद उसे अंदाजा नहीं है। जब एक लडक़ी घर से भाग कर शादी करती हैं तो वह चुरा ले जाती है अपने माता-पिता के वह सारे सपने जो उन्होंने उसके विवाह के लिए संजोये थे। यहां केवल बात पिता के या परिवार की इज्जत की नहीं है। यहां बात है उन सपनों की जो 20-22 वर्षों से माता-पिता अपनी औलाद के लिए संजोया करते हैं। हर दिन अपनी बडी़ होती बेटी के साथ वे पल-पल का सपना बुनती है, कैसे विदा करेंगे? कैसे रह जायेंगे उसके जाने के बाद? लेकिन घर से भागकर वह छीन लेती है अपने माता-पिता से ईश्वर प्रदत्त कन्यादान का अधिकार। जब वह घर से भाग कर चली जाती है तो अपने माता पिता से एक महान पुण्य और एक ऋण को उतारने का कार्य कन्यादान का अवसर वह भी छीन ली जाती है। एक माता-पिता कन्यादान करके अपने आप को गौरवान्वित की महसूस कर सकते हैं। वह गौरव के क्षण छीन ले जाती है और छीन ले जाती वह अपने छोटे या बड़े भाई बहनों से वह विदाई के क्षणों का एहसास, जो एक विवाह में ही देखने को मिल सकता है।
यह घर से भाग कर शादी करने की संस्कृति है या विचार कहां उत्पन्न आते हैं। ऐसे विचारधाराओं के उत्पन्न होने के पीछे जहां तक मैं मानता हूं बॉलीवुड और टीवी सीरियल का बहुत बड़ा हाथ है। हमारे बॉलीवुड की अधिकांश फिल्मों में यही दर्शाया जाता है कि माता-पिता गलत है और उनके प्रेमी या प्रेमिका सही है उनके माता माता-पिता प्रेम के दुश्मन है। माता-पिता उनका भला नहीं चाहते। उनकी खुशियों को बर्दाश्त नहीं कर सकते। 80 फीसदी फिल्मों में सिर्फ एक ही चीज दिखाई जाती है, माता-पिता और परिवार वालों को गलत साबित करना। इन फिल्मों में कभी अमीर-गरीब के नाम पर और कभी जाति के नाम पर माता-पिता को गलत साबित किया जाता है।
15-16 वर्षीय जो बच्चे हैं उनको टारगेट करते हुए स्कूल के बच्चों में प्रेम कथाएं दिखाई जाती है। पुरानी फिल्मों में अगर देखे तो वह भी तू 16 बरस की मैं 17 बरस का ऐसे गाने बनाए जाते हैं जो आज भी जारी है। हमारे इन किशोर अवस्था के बच्चों को सपने दिखाया जाते है, कि वह एक प्रेम की अलग दुनिया बसाये अपने माता-पिता से दूर जाकर। बाद में इस प्रेम की परिणिति क्या होगी। इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन एक प्रकार से हमारी जो युवा पीढ़ी और जब किशोर में पीढ़ी के बच्चे हैं उनके दिमाग में 90 फीसदी तक यह बातें भरने में सफल रहे हैं, कि जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य प्रेम है।
प्रेम करो ना मना किसने किया है, आपके माता-पिता जो आपके जन्म से लेकर के आज तक आपके लिए कर रहे हैं उनसे प्रेम करो अपने भाई बहनों से प्रेम करो अपने पारिवारिक सदस्यों से प्रेम करो ज्यादा प्रेम उमड़ रहा है तो देश से भी कर लो।
जब आपको जरा सी चोट लग जाए तो किस प्रकार से माता-पिता परेशान हो जाते हैं। भाई-बहन किस प्रकार आपके आगे पीछे चक्कर लगा कर के आपके लिए एक नौकर की तरह भाग भाग कर कार्य करते हैं। उन चीजों को याद करो नहीं। लेकिन वह सब बातें याद नहीं रहती हैं। जैसे ही किसी विपरीत लिंग के संपर्क में आते हैं चाहे लडक़ा हो या लडक़ी खासतौर पर लड़कियां जो की मानसिक रूप से बहुत ही इमोशनल होती है ऐसे चक्कर में पड़ जाती है और कई बार लडक़े भी अपनी बातों से इस प्रकार से बरगला कर ले जाते हैं, कि वह अपना भला-बुरा सोच ही नहीं पाती। उसके पीछे एक जो प्रमुख कारण है वह वैज्ञानिक रूप से अगर देखा जाए तो इस उम्र में हार्मोनल जो बदलाव होते हैं उनके कारण अपोजिट सेक्स के प्रति बहुत ज्यादा आकर्षित रहता है और इसी कारण उसे अपने घर वाले अपने दुश्मन प्रतीत होते हैं।
ऐसी घटनाओं से बचने के लिए क्या किया जाए ? माता-पिता को चाहिए कि वह अपने बच्चों के साथ मित्रवत व्यवहार करें उनसे खुल कर बातें करें। उनके दिनचर्या और जीवन शैली से अच्छे से परिचित रहे। उन्हें समय पर यह जताते रहे उनका भविष्य पहले है और आप ही उसे अन्य की अपेक्षा बेहतर सोच सकते है। मन में कोई शंका या समस्या हो तो अपने माता-पिता अवश्य बताएं, ताकि उसके बारे में उचित निर्णय ले सके। अगर तुम किसी से प्रेम करते हो शादी करना चाहते हो तो उसे भी एक बार माता-पिता से अवश्य मिलवाईये ताकि वो उसे आपके लिए परख सके। क्या आपके माता-पिता से बेहतर आपके लिए कोई सोच सकता है ? नहीं ऐसा शायद कोई नहीं है।
जब एक लडक़ी घर से भाग कर शादी करती है तो वह छीन ले जाती है अपनी छोटी बहनों और समाज की बहुत-सी लड़कियों के सपने। जहां वे पढ़ कर कुछ बनना चाहती थी। कोई डॉक्टर, वकील, इंजीनियर आदि। उनके कृत्य की सजा उन छोटी बहनों और समाज की उन लड़कियों को मिलती है जो आगे बढऩा चाहती थी। माता-पिता एक उदाहरण देखने के बाद अन्य लड़कियों पर पहरा बिठा देते हैं। इस प्रकार एक लडक़ी की सजा समाज में बहुत सारी लड़कियों को भुगतनी पड़ती है।
इसलिए युवाओं को चाहिए कि जीवन का आधार प्रेम है। वह केवल पे्रमी-प्रेमिका का ना होकर या लडक़े-लडक़ी का ना होकर उससे कहीं आगे है। प्रेम श्रीकृष्ण-सुदामा का था दोस्ती के लिए। प्रेम श्रवण कुमार का था अपने माता-पिता के लिए। प्रेम राजा दशरथ का था अपने पुत्र राम के वियोग में मृत्यु को गले लगाते। रानी झांसी का था जो अपने पति की मृत्यु के बाद झांसी का राज्य संभालकर खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।
इसलिए मेरा यह मानना है कि प्रेम जीवन का आधार है और वह समर्पण मांगता है। जैसे माता-पिता अपनी औलाद के लिए सबकुछ समर्पित कर देते है और आजकल के बच्चे प्रेम के लिए कुछ भी करने को तैयार है। यहां प्रेम की परिभाषा ही बदल दी गई है। प्राप्त करना ही प्रेम नहीं है। त्याग और समर्पण करना भी प्रेम है। माता-पिता हमारे जीवन के आधार है और आधार के साथ छेड़-छाड़ नहीं करनी चाहिए फिर चाहे आपका जीवन हो या आपका महल। आधार के सरकने से महल खंड़हर में तफदील हो जाते है। जीवन काटने को दौड़ता है। इसलिए लिए समय रहते संभले और माता-पिता की इज्जत और हितों का ख्याल रखें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *