महाराणा प्रताप जयंती पर सम्मान समारोह आयोजित, छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप एक ही काल में होते तो भारत का इतिहास कुछ और होता-राज्यपाल

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ब्यूरो चीफ रविसिंह किरार/ परिष्कार जयपुर। राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने महाराणा प्रताप जयंती पर बुधवार को क्षत्रिय समाज की प्रतिभाओं को सम्मानित किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप एक ही काल में होते तो भारत का इतिहास कुछ और होता। उन्होंने कहा कि दोनों ने ही मुगल आक्रांताओं को अपनी वीरता, साहस और शौर्य से उनके इरादों में नाकाम किया।

 राज्यपाल ने कहा कि हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप ने मुगल सेना को हतोत्साहित किया और बाद में सुनियोजित हमला करके दिवेर के युद्ध में अकबर की सेना से आत्मसमर्पण करवाया। महाराणा प्रताप देश के पहले ऐसे स्वाधीनता सेनानी थे जिन्होंने मातृभूमि के लिए निरंतर लड़ाइयाँ लड़ी और अदम्य साहस और वीरता का परिचय देते हुए हमें गौरवान्वित किया।

 राज्यपाल ने कहा कि अकबर ने सीधे महाराणा प्रताप से युद्ध नहीं किया बल्कि राजा मानसिंह को युद्ध के लिए भेजा। महाराणा प्रताप की सेना बीस हजार के लगभग थी और अकबर की सेना एक लाख के करीब थी। चार गुना सेना अधिक होने के बावजूद महाराणा प्रताप ने अदम्य साहस का परिचय दिखाते हुए इस युद्ध में मुगल सेना को धूल चटाई। बागडे बुधवार को भारतीय क्षत्रिय महासंघ द्वारा महाराणा प्रताप जयंती पर आयोजित सम्मान समारोह में सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मेवाड़ गौरवमय धरा रही है। यह भक्ति और शक्ति की धरती है। यही वह धरती है जहां पर बप्पा रावल जैसे महान प्रतापी हुए। बप्पा रावल ने अरबों को भारत से खदेड़ा। इसके बाद पूरे सौ साल तक वह भारत की ओर झांक नहीं सके थे। उन्होंने महाराणा सांगा, पन्ना धाय आदि को स्मरण करते हुए कहा कि भारत के सच्चे इतिहास की नई पीढ़ी को जानकारी मिलनी चाहिए। इसके लिए उन्होंने नई शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परम्परा और बच्चों की बौद्धिक क्षमता बढ़ाने का आह्वान किया।

राज्यपाल ने कहा कि महाराणा प्रताप नैतिक और स्त्री अस्मिता में विश्वास रखने वाले महान शासक थे। जब उनके पुत्र अमरसिंह ने मुगल सेनापति अब्दुल रहिम खान ए-खाना के परिवार की महिलाओं को बंदी बनाया तो प्रताप ने कडा विरोध किया और उन बेगमों को पूरे सम्मान के साथ वापिस भिजवाया। मातृभूमि के लिए किया गया उनका संघर्ष उनके अदम्य साहस, वीरता और पराक्रम की ही कहानी है। उनकी सेना में केवल राजपूत ही नहीं, बल्कि भील जनजाति, जाट और अन्य जातियों के योद्धा भी शामिल थे। भील सरदार राणा पूंजा उनकी सेना के प्रमुख स्तंभ थे। बागडे ने कहा कि महाराणा प्रताप की जन्म-जयंती हमें उनके आदर्शो पर चलते हुए जीवन में अन्याय और अनैतिकताओं से लड़ने की प्रेरणा देने वाली है।

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